मुद्दते लफ्फाजी की हो गयी
तेरा सितम वक़्त से आगे था
जो थी बातें अनकही
वो वक़्त कहता चला गया
मै था वक़्त की रेत पर
उलझते वक़्त की लटों को सुलझाता हुआ
तू था तेरा नाम था
गुरुर तेरा रब का मुकाम था
चर्चा मेरा सरे आम था
मै था मेरी तन्हाई थी
तुझ से जुदाई न चाही थी मैंने
पर वक़्त था
मै बेबस था अपनी बेवफाई पर
जो था वक़्त था
वक़्त की मुटठी में कैद था मै रेत की मानिंद
सरकती रही मेरी बेबसी तेरे रब बनने के साथ साथ
तू था , तेरी ऊंचाई थी , में था ,मेरी बेवफाई थी
उलझती रही लटें मेरी उमीदों की रेत के साथ साथ
गुरुर तेरा रब का मुकाम था
सरकती रही मेरी बेबसी तेरे रब बनने के साथ साथ
तू था , तेरी ऊंचाई थी , में था ,मेरी बेवफाई थी .
(C) Devendra Joshi
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